मंगलवार, 14 नवंबर 2017

क्रांति का ये नया अंदाज होगा

अभी अभी लिखी कविता ---
ये देश जागीर है किसकी जनता की ,सत्ता की या पूजीपतियो की और नौकरशाही की तय होना अभी भी बाकी बहाता है किसान पसीना और मोटा हों जाता है बनिया उसकीं उपज पर व्यापारी और बिचौलिया बहाता है मजदूर पसीना और फिर होती है यहीं कहानी रक्षा करता जवान देश की और सीना फुला कर फायदा उठा लेता है नेता आखिर कौन है मुल्क का मालिक ये सब या फिर सब ,सारी जनता क्यों नहीं मिलता सबको सबका वाजिब हक कब बदलेगी ये व्यवस्था और सचमुच का लोकतंत्र मिलेगा संभव बराबर सब होंगे जब समान शिक्षा सबको मिलेगी सामान चिकित्सा होगी सबको और सामान अवसर भी होगा जरूरत है सम्पूर्ण क्रांति की गाँधी के रस्ते पर चल कर रक्तहीन पर समीचीन फैसलाकुन क्रांति की कब आएगी कौन करेगा मैं निकलूं तुम भी निकलो सबको ही हम साथ मिला चलो हाथ से हाथ मिला ले जो शोषक है मिलकर उनकी भी इस क्रांति को समझा दे हर अंतिम का दर्द दिखा दे शायद वो समझ ही जाये वो भी हमसे हाथ मिलाये वर्ना हमको तो उठना ही हर अंतिम को तो जगना ही मुट्ठी भींच अधिकार मांग लो हो सबका प्यार मांग लो वर्ना हक तो लेना ही है जिनके पास है देना ही है पांच गाँव जब न देता हो लड़कर अपना हिस्सा लेना पर उका उसको दे देना नयी क्रांति का आगाज होगा सबका अपना कल भी होगा सबका अपना आज होगा क्रांति का ये नया अंदाज होगा





























































शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

मन रही है दीवाली

मन रही है दीवाली 
हर साल की तरह 
कम होते गए घर से लोग 
अब रह गए हम दो
लोगो के घरो में 
बने है पकवान 
मेरा बेटा भी होटल से 
लाया है पकवान 
लोगो के घरो में 
सजी है रंगोली 
मेरे बेटे ने भी 
कुछ रख दिया है
जमीन पर 
लोगो के बच्चे और बड़े भी 
छोड़ रहे है पटाखे 
मैं बिस्तर पर पड़ा 
सुन रहा हूँ आवाजे 
और 
मेरा बेटा बाहर खड़ा 
देख रहा है सबको फोड़ते 
मेरे घर भी आई है मिठाई 
पर  पता नहीं क्यों 
मिलने आने वालो की तादात 
घट जाती हैं बुरी तरह 
जब किसी पद पर नहीं होता हूँ मैं 
हमने खरीदा है कुम्हार के बनाये 
दिए और लक्ष्मी गणेश 
थोड़ी सी खील और बतासे भी 
ताकि इनको बनाने वालो की 
कुछ मदद हो जाये
और
हार न जाये ये 
देश के दुश्मन चीन से 
और मन गयी 
मेरी और मेरे बेटे की भी दीवाली

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

सब मरे थे

एक मैदान था ।
चारो तरफ सैनिक ही सैनिक थे ,
हुँकार थी ,
शोर था
टंकार थी
पंर
सन्नाटा था गहरा
और
कृष्ण ने रहस्य खोला
देखो सब मरे हुए है ।
कुछ ऐसा ही

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

जब और जितनी बार भी

जब और जितनी बार भी
अपने घर लौटता हूँ
और
दरवाजा खोलता हूँ
बिजली सी कौंध जाती है
और
दीवारो पर बन जाती है
अंनगिनत तस्वीरें
और
मन का बादल बरस उठता है ।
लहरो पर तैर जाती है
यादो की कितनी कागजी नावें
और कागज की नाव
तो कागज की ही होती है
खो जाती है अथाह पानी में
और
पसर जाता है सन्नाटा
दीवारो से छत तक
और
बैठक से बिस्तर तक ।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

कौन कंगाल है

अपने घर , बच्चे
और
पिता के दर्द और तकलीफ में
क्या खूब संतुलन बैठाती हुई बेटी
पिता के दुख में मरहम लगाती हुई बेटी
दूर नौकरी की मजबूरी
फिर भी भाग कर आती हुई बेटी
पिता के दर्द से छटपटाती हुई बेटी
नौकरी , कैरियर और पिता की तड़प
में संतुलन बैठाता हुआ बेटा
पिता की तकलीफ को कम करने को
फड़फड़ाता हुआ बेटा
अपनी नींद और भूख भूल
पिता ही पिता में पूरा मन लगाता हुआ बेटा
नही हो धन दौलत ,पद और प्रतिष्ठा
पर ऐसा पिता तो कितना मालामाल है
होंगे उनके और उनके बच्चो के पास
धन, दौलत, पद ,प्रतिष्ठा ,सब कुछ
पर
ये सब नही है
तो
वो बाप किस कदर कंगाल है ।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी

कब होगी पहचान हमारी

इतने सालो से है दूरी

क्या मजबूरी

जिन्दा तो है

पर क्या सचमुच

क्या जीवन इसको कहते है

पांव में छाले भाव में थिरकन

गले में हिचकी आँख में आंसू 

नीद नहीं और पेट में हलचल

ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ

बस अन्धकार है

क्या जीवन इसको कहते है

जीवन कब हमको मिलना है

या फिर ऐसे ही विदा करोगे

कुछ तो सोचो

हम दोनों क्या जुदा जुदा है

कुछ तो बोलो

और भविष्य के ही पट खोलो

या फिर कह दो

हां जीवन इसको ही कहते है |

जींना है तो हंस कर जी लो

या फिर दर्द गरल को पी लो

तेरे हिस्से में बस ये है

मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ

तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ

चल अब सो जा

अच्छे सपनो में आज तो खो जा

कल फिर मुझसे ही लड़ना है

हां जीवन इसको कहते है |

रविवार, 23 जुलाई 2017

खुद से कौन लड़ पाया है |


मैं लड़ रहा हूँ
उम्र से
बीमारियों से
और
अकेलेपन से
दूसरे से लड़ना तो आसान है
पर खुद में
और
खुद से कौन लड़ पाया है | 

गुरुवार, 29 जून 2017

कल सपने थे आंखों में आगे ही बढ़ते जाएंगे

कल सपने थे आँखों में आगे ही बढ़ाते जायेंगे
जितने भी पीछे थे कल हम आगे चढ़ते जायेंगे |

जिसने दर्द नहीं झेला था आजादी की जंग का
जिसका नज़रिया इस पर इतना ज्यादा तंग था
झूल रहे थे फंसी पर जब ये मुखबिरी कराते थे
वतन के लड़ने वालो को ये जेल जेल पहुचाते थे |

कहा कल्पना की थी हमने केि ये शासन में आयेंगे
तब गद्दारी की थी देश से अब ये ही देश मिटायेंगे |



शनिवार, 17 जून 2017

चलो अब बंद करता हूँ खिड़कियाँ

चलो अब बंद करता हूँ
खिड़कियाँ
कमरे की
और मन की भी
चिंतन की
और आँखों की भी
बुझा देता हूँ रौशनी
ताकि छा जाये अँधेरा
अंदर भी और बाहर भी
क्योकि
अँधेरा हमें सुकून देता है
और
हर चीज से
आँख बंद कर लेने का बहाना
सो जाता हूँ मैं भी
सोने दो लोगो को भूखे पेट
या फुटपाथ के थपेड़ों
और बारिश में
लगने दो आग
किसी की आबरू में
लूटने दो इज्जत या असबाब
मुझे क्या
मैंने तो गर्त कर लिया है
खुद को अँधेरे में
और बंद कर ली है खिड़कियाँ
ताकि
कोई चीख सुनाई न पड़े
और न दिखाई दे
बाहर के अँधेरे
मेरे अंदर के अँधेरे
अब मेरे साथी बन गए है न
चलो मुझे गहरी नीद सो जाने दो
इस व्यवस्था की तरह ।

गुरुवार, 15 जून 2017

टीवी की क्या मजबूरी है ?

टीवी की क्या मजबूरी है ?
सुबह बाबा और रात भी बाबा
और
तरह तरह की दवाई वाले जरूरी है
ऐसा नहीं हो सकता कि
सुबह भी
मुहब्बत के गीत सुनाओ
और तरह तरह से हँसाओ
और
रात भी ऐसे ही गीत सुनाओ
और हंसा कर सुलाओ
फिर दिन भर खूब लाशे
या लाशे बनाने की
फैक्टरियां दिखाओ ।

शुक्रवार, 19 मई 2017

फट न जाये अस्तित्व ही ।

क्या कभी आपने महसूसा है
की
बाहर घनघोर सन्नाटा हो
और
अंदर दमघोटू और इतना शोर
की
लगता है नसे ही नही
शरीर की कोशिकाएँ भी
फट पड़ेंगी
नही हो सकती इससे बड़ी सज़ा
फांसी में
एक झटके से मुक्ति मिल जाती हैं
और
अजीवन कारावास में भी
लोगो का साथ
पर ऐसी सज़ा कल्पनातीत है
पता नही
किसी को इस सज़ा का एहसास है
या नही
इससे ज्यादा लिखा नही जा सकता
इस विषय पर
जेल से भी पेरोल मिल जाती है
जिंदगी में भी
कोई पेरोल की व्यवस्था हो सकती है
कौन मुक्ति देगा इससे
मुक्ति मिलेगी भी या नही ।
या
सन्नाटा और
अथाह लहू में बहता शोर
साथ साथ चलते रहेंगे
जब तक
फट न जाये अस्तित्व ही ।

पहले हमसे यारी कर मिल करके गद्दारी करमैं हारूं और जीते तू ऐसी साज़िश भारी कर ।

पहले हमसे यारी कर
मिल करके गद्दारी कर
मैं हारूं और  जीते   तू
ऐसी साज़िश भारी कर ।

कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।

कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ
जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।

हम किस कदर लड़ते थे तुम्हारे लिए फिर तुमने निगाहों से गिरा क्यो लिया ।

हम किस कदर लड़ते थे तुम्हारे लिए
फिर तुमने निगाहों से गिरा क्यो लिया ।

गुरुवार, 18 मई 2017

कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।

कुछ सवाल है तेरे मेरे दरमियाँ
जवाब में तू भी चुप में भी चुप ।

मतलबी तो हजारो मिले है कभी कोई दोस्त होगा क्या ?

मतलबी तो हजारो मिले है
कभी कोई दोस्त होगा क्या ?

चलो अब हम टूट जाते है चलो तुम लूट लो हमको ।

चलो अब हम टूट जाते है
चलो तुम लूट लो हमको ।

बुधवार, 17 मई 2017

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा

लोकतंत्र का नपुंसक गुस्सा 
हा
मुझे बचपन से गुस्सा आता था
किसी इंसान को अपशब्दों के साथ
जाति के  संबोधन से
मुझे गुस्सा आता था
शाहगंज से लखनऊ होते आगरा तक
मैं ट्रेन के दरवाजे पर
या बाथरूम के पास बैठ कर आता था
की
भीड़ ज्यादा है तो 
ट्रेन में डिब्बे क्यो नही बढ़ते
मुझे गुस्सा आता था जब कोई
दूसरों के मैले को उठा कर
सर पर लेकर जाता था
गुस्सा आता था जब दूर से फेंक कर
किसी को खाना दिया जाता था
गुस्सा आता था
जब सायकिल के हैंडिल पर
दो बाल्टियां
और
पीछे कैरियर पर मटका रख
दो मील दूर पानी लेने जाता था
शहर में
गुस्सा आता था
जब गांव जाने के लिए
मीलो सर पर बक्सा रख कर
चलना पड़ता था अंधेरे ने
गुस्सा आता था
जब गांव में बिजली भी नही थी
गुस्सा आता था
जब पुलिस अंकल किसी को
बिना कारण बांध कर ले जाते थे
माँ बहन की गालियां देते हुए
और
न जाने कितनी बातो पर गुस्सा आता था
पर किसी भी चीज को
बदल सकने की ताकत नही थी
इस बच्चे में
उसके बाद भी
बहुत गुस्सा आता रहा रोज रोज
और आज भी गुस्सा खत्म नही हुआ
रामपुर तिराहे पर गुस्सा हुआ था मैं
हल्ला बोल पर भी गुस्सा दिखाया था
पर खुद शिकार हो गया
हर बात पर जिस पर
जिंदा आदमी को गुस्सा आना चाहिए
मुझे तो गुस्सा आता रहा
और
मैं दुश्मनो में शुमार हो गया
मुझे निर्भया ,दादरी ,मुजफ्फरनगर
और
रंगारंग कार्यक्रम पर भी गुस्सा आया
पर
ताली पिटती भीड़ में
खो गया मेरा गुस्सा
और में भी खो गया साथ साथ
पानी पीकर या पानी के बिना
लोगो के मर जाने पर भी आया गुस्सा
संसद हो या मुम्बई
मेरा गुस्सा सड़क पर आया
लॉटरी हो या शहादत
सड़क पर फूटा गुस्सा
वो खरीदने अथवा मारने की धमकी
नही रोक सकी मेरे गुस्से को
धक्के खाती जनता और कार्यकर्ता
भी बने मेरे गुस्से के कारण
मुझे आज भी गुस्सा आता है
बार बार बदलते कपड़ो पर
अन्य देशों में मेर देश की बुराई पर
पिटती विदेश नीति
और अर्थव्यवस्था पर
रोज शहीद होते सैनिको पर
कश्मीर ,अरुणाचल और नागालैंड पर
रोज के बलात्कार पर
रोहतक से छत्तीसगढ़ तक पर
गुस्सा आया है सहारनपुर पर मथुरा पर
इंच इंच में होते अपराध पर
थाने से तहसील होते हुये
आसमान तक के भ्रष्टाचार पर
भाषणों के खेप पर
आसमान छूती महंगाई पर
न जाने कितनी चीजे है
गुस्सा होने को
पर अब
में देशद्रोही करार कर दिया जाता हूँ ।
और
मेरा गुस्सा अपनी नपुंसकता
और
आवाज के दबने पर उफान मारता है
पर
मेरे छोटा हाथ , मेरा छोटा सा कद
और साधारण आवाज
सिमट जाती है कागज के पन्नो पर
फेसबुक ट्विटर ,ब्लॉगर पर
और दीवारों के बीच
क्योकि इस देश मे गरीब के लिए
गरीबी और बेकारी से लड़ने को भी
धर्म या जाति की भीड़ चाहिए
जो मेरे पास नही है
और
चाहिए धन काफी धन
जो मंच सज़ा सके
,रथ बना सके
और मीडिया को बुला सके ।
जो मेरे पास नही है
गुस्सा होकर बैठ जाता हूँ लिखने
कोई कविता या कुछ विचार
ताकि गुस्सा
समय के थपेड़े में मर न जाये ।

मंगलवार, 16 मई 2017

रोज की जिंदगी और ये घर ।

रोज की जिंदगी और ये घर ।
=================
एक घर है
जिसके बाहर एक गेट
और
उससे बाहर मैं तभी निकलता हूँ
जब शहर कर बाहर जाना हो
या डॉक्टर के यहा जाने की मजबुरी
फिर एक लान है
जहा अब कभी नही बैठता
किसी के जाने के बाद
फिर एक बरामदा
वहाँ भी आखिरी बार तब बैठा था
जब बेटियाँ घर पर थी
और बारिश हुई थी
और
मेरा शौक बारिश होने पर
बरामदे में बैठ कर हलुवा
और गर्मागर्म पकौड़ियां खाना
और अदरक की चाय
वो पूरा हुआ था आखिरी दिन
हा
ड्रॉईंग रूम जरूर गुलजार रहता है
वही बीतता है ज्यादा समय
सामने टी वी , मेज पर लैपटॉप
और
वो खिड़की
जिससे बाहर आते जाते लोग एहसास किराते है
की आसपास इंसान और भी है
अंदर मेरा प्रिय टी कार्नर
जहा सुबह क्या दोपहर तक बीत जाती है
नाश्ते चाय ,अखबार ,फोन और फेसबुक  ट्विटर और ब्लॉगर में
पता नही चलता कैसे बिना नहाए शाम भी हो जाती हूं उस कोने में
बच्चो का कमरा न जाये तो अच्छा
अब कौन याद करे
रसोई में जाना जरूरी है
और बाथरूम में भी
थोड़ा लट लो वाकर पर
और खुद को बेवकूफ बना लो
की हमने भी फिटनेस किया
पांच बदाम भी कहा लो
कपड़े गंदे हो गए मशीन है
बस डालना और निकलना ही तो है
नाश्ता और खाना
और कुछ अबूझ लिखने की कोशिश
घृणा हो गयी ज्ञान और किताबो से
जिंदगी बिगड़ दिया इन्होंने
पर बेमन से पढने की कोशिश
कभी कभी आ जाता है कोई
भूला भटका , उसकी और अपनी चिंता चाय
और
बिना विषय के समय काटना
लो हो गयी शाम
है एक साथ कर ले सुरमई उसके साथ
और
कुछ पेट मे भी चला ही जाए
बिस्तर कितनी अच्छी चीज है
नीद नही आ रही लिख ही दे कुछ
नीद दवाई भी क्या ईजाद किया है
जीभ के नीचे दबावो
और सो जाओ बेफिकर
अब कल की कल देखेंगे
छोटा पडने वाला घर
किंतना बड़ा हो गया है
और
छोटे से दिन हफ्ते जैसे हो गए है
पर बीत जाता है हर दिन भी
और घर के कोने में सिमट कर
भूल जाती है बाहरी दीवारे ,कमरे
आज भी बीत गया एक दिन
और रीत गया जिंदगी से भी कुछ
कही से बजी कोई पायल
नही रात को एक बजे का भ्रम
सो जाता हूँ
ऐसे ही कल के इंतजार में अकेला ।
हा नितांत अकेला
बस छत ,दीवारे और सन्नाटा
ओढ़कर ।

गुरुवार, 11 मई 2017

मौत और अकेलापन ________________

मौत और अकेलापन
________________
मौत कितनी
खूबसूरत चीज होती है
हो जाता है
सब कुछ शांत शांत
गहरी नींद
तनावमुक्त ,शांत शांत
न किसी का लेना
न किसी का देना
कोई भाव ही नही
कोई इच्छा ही नही
न डर ,न भूख ,न छल
न काम न क्रोध
बस शांति ही शांति
विश्राम ही विश्राम
कोई नही दिख रहा
और सब देख रहे है
न रोटी की चिंता
न बेटे और बेटी की
न घर की चिंता
न बिजलो और पानी की
न बैंक की चिंता
न टैक्स जमा करने की
न काम की चिंता
और न किसी छुट्टी की
न किसी खुशी की चिंता
न किसी की नाराजगी की
निर्विकार ,स्थूल
हल्का हल्का सब कुछ
देखो
कितना सपाट हो गया है चेहरा
कोई पढ़ नही पा रहा कुछ भी
किसी को
गजब का तेज लग रहा है
बहुत कुछ है खूबसूरत
पर मौत से तो कम
और मुझे तो
मौत से भी ज्यादा अक्सर
मजेदार लगता है अकेलापन
सन्नाटा ही सन्नाटा
कोई आवाज ही नही
खुद की सांसो के सिवाय
कोई भी नही खुद के सिवाय
पंखे के आवाज तो
कभी कभी फोन की
और
हा दब गया रिमोट
तो टी वी की भी आवाज
तोड़ देती है सन्नाटा
और
झकझोर देती है अकेलेपन को
पर
गजब का मुकाबला है
मौत और अकेलेपन का
हा
एक फर्क तो है दोनो में
मौत खूबसूरत होती है
पर अकेलापन बदसूरत
मौत शांत होती है
पर अकेलापन
अंदर से विस्फोटक ।
मौत के बारे में
लौट कर किसी ने नही बताया
उसका अनुभव
पर
अकेलेपन को तो
मैं जानता भी हैं
और पहचानता भी हूँ
अच्छी तरह ।
मौत का अंत अकेलापन है
और
अकेलेपन का अंत मौत ।
इसलिए
मौत से डरो मत उसे प्यार करो
अकेलेपन से हो सके तो भागो
और
इसे स्वीकारने से इनकार करो ।

बुधवार, 10 मई 2017

पहले भी नवाबो और राजाओं की रक्काशा और गणिकाएँ होती थी

पहले भी नवाबो और राजाओं की
रक्काशा और गणिकाएँ होती थी
पर उनकी भी कुछ सीमाएं होती थी
आज की राजनीति में
सिर्फ रक्काशा और गणिकाएँ होती है
उसकी कुछ भी सीमाएं नही होती है ।
तब के राजा अपना काम खत्म कर महफ़िल जमाते थे
आज के हर वक्त सिर्फ काम की महफ़िल जमाते है
तबके राजा आमसभा से अलग पर्दे में हरम बनाते थे
आज के आमसभा को ही हरम बना देते है
तब कोई खासियत होती थी गणिका और रक्काशा बनने की
आज बस औरत जो जाना ही काफी है
तब गणिका और रक्काशा भी कर्मच्युत नही होने देती थी ज्यादातर
अब कर्म लायक ही नही रहने देती है
तब की गणिकाओं ने युद्ध भी लड़े और जौहर भी किये
अब के राजाओं में गणिकाओं के लिए युद्ध हो रहे और कर्मो का जौहर भी ।
हा बहुत फर्क हो गया है समय के साथ आदत और अंदाज़ में
बड़े से बड़े राजा के यहां आप का हुनर और बेबसी दोनों मार खा जाएंगे
फिर जरा हुस्न को आजमाइए जब तीर निशाने पर ही जायेंगे ।
हमसे कहते है हमारी इज्जत करो और जय जय कार करो
हा और तुम अस्मत ,दौलत और सत्ता का केवल और केवल व्यापार करो ।
वैसे जिनकी अजेय और व्यापक सत्ताएं थी और बड़े बड़े हरम थे उनके भी निशा  कहा है
फिर आज वाले तो लोकतन्त्र के जमूरे है
इनकी निशानी भी कहा होगी ।
गणिका से गणिका तक ही पूरा हो जायेगा सफर पूरा जिन्दगी का ।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

जरूर जरूर कोई बहुत ही अपना था ।

रोटी थी कपड़ा और मकान अच्छा सा
जरूर जरूर ये कोई अपना सपना था
वो बिन पहचाने बगल से निकल गया
जरूर जरूर कोई बहुत ही अपना था ।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

कभी समन्दर के किनारे

कभी
समन्दर के किनारे
खड़े होकर
दूर देखा है आप ने
लगता है कि
कुछ ही दूर पर
आसमान मिल रहा है
समन्दर से
पर जब आगे बढ़ते है
नाव से या जहाज से
तो वो मिलन
और दूर चला जाता है
वैसी ही होती है
कुछ जिंदगियां
और कुछ के भविष्य
इच्छाये ,खुशियाँ और आशाएं ।
मैं भी
ताक रहा हूँ टुकुर टुकुर
दूर से दूर तक
बहुत दिनों से
और भाग रहा हूँ लगातार
की आसमान को छू लूँ  ।
पर
या तो आसमान छल करता है
या
मेरा पुरुषार्थ ही जवाब दे जाता है
और
हाथ भी तो छोटे पड़ जाते है मेरे ।

पेड़ भी जड़ होता है

पेड़ भी जड़ होता है
पर अपनी जड़ो
और पत्तो के साथ
और कोई कोई
फल के भी साथ
वो देता है छाया
भरता है पेट
और सूख जाता है
तब भी
बन जाता है ईंधन
पर जब कोई इंसान
जड़ हो जाता है
तो
न बन पता है सहारा
न सम्बल
और न ही प्रेरणा ।
न छाया ,न फल ,न ईंधन
कितना बेकार होता है ।
ऐसा इंसा
और
मैं ऐसे कई इंसानो को
जानता हूँ
जो पेड़ से जलते है
और अपने आप में भी ।

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

इतनी दूर क्यो चले गये समंदर को देखने मेरी आँखों मे देख लेते उतना ही खारा है ।

इतनी दूर क्यो चले गये समंदर को देखने
मेरी आँखों मे देख लेते उतना ही खारा है ।

इतनी दूर तुम कहा चले गये हो समंदर को देखने मेरी आँखों मे देख लेते उतना ही गहरा और खारा है ।

इतनी दूर तुम कहा चले गये हो समंदर को देखने
मेरी आँखों मे देख लेते उतना ही गहरा और खारा है ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

काफी दिनों से खुद से ही बात कर रहा हूँ
या तो बात नहीं होती या लफ्ज नहीं होते ।

इसीलिए आज बाजार में हूँ ।और बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सुनो सुनो सुनो ,
कोई मुझे भी खरीद लो
जी बिकाऊ हूँ मैं
जैसा भी हूँ
पर आज बाजार में हूँ
बाजार का युग है
इतना खोटा भी नहीं कि
मेरी कुछ कीमत ही नही 
बोली तो लगाओ
कही से तो शुरू करो
चलो तुम रोटी से शुरू करो
चुपड़ी नहीं रूखी ही सही
और तुम कपडे से
उतरन भी चलेगी
तुम नीद की जगह दोगे
पर नीद कौन देगा
पर बोलो ,जो चाहो बोलो
इतना सस्ता इमांन कहा मिलेगा
इतना सस्ता ज्ञान कहा मिलेगा
और
आज इंसान कहा मिलेगा
तो बताओ कौन खरीदेगा मुझे
जी हा
कसम खुदा की मैं बाजार में हूँ
खरीद रहे हो बेपनाह हुस्न
लोगो के इमांन
जनता के रहनुमा
तो मुझमे क्या कमी है
ईमान से डर लगता है
या फिर
इंसान से डर लगता है
अरे नहीं
बिकाऊ है आज ये भी
कोई तो बोलो
मेरे इंसान और ईमान को
कोई तो सिक्को में तोलो
कोई नहीं बोलोगे
तो रो पडूंगा मैं बेबसी पर
फिर
आंसू तो बिलकूल नहीं खरीदोगे
अब हुस्न कहा से लाऊँ
मैं भी दल्ला हो सकता हूँ
ये कैसे समझाऊँ
या फिर ये बनी हुयी इमेज
मिटा के आऊँ
तो उसके लिए
किस लॉन्ड्री में जाऊं ।
कोई तो खरीद लो न मुझे ।
जी हां मैं आज बिकाऊ हूँ
और
इसीलिए आज बाजार में हूँ ।
और
बिकने वाले हर इश्तहार में हूँ ।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

कहा अकेला हूँ मैं देखो
सूरज चाँद सितारे  मेरे
चिड़ियों का कलरव है मेरा
धूप है मेरी धूल है मेरी
बादल मेरे बारिश मेरी
घर की गर वीरानी मेरी
तो सडंको के शोर भी मेरे
बाज़ारों की हलचल मेरी
और नाचता मोर भी मेरा
छत मेरी दीवारें मेरी
घर में जो है सारे मेरे
बातें मेरी और राते मेरी
वादे मेरे और यादें मेरी
और किसी को क्या चाहिए
इतना तो सब कुछ घेरे है
जीवन क्या है बस डेरा है
आज यहाँ है और कही कल
कुछ साँसों का बस फेरा है
सभी अकेले ही आते है
सभी अकेले ही जाते है
कौन अकेला नहीं यह पर
भीड़ में है पर बहुत अकेले
मैं अकेला घिरा हूँ कितना
इतना सब कुछ पास है मेरे
लोगों के जीवन में देखो
विकट अंधेरे बहुत अंधेरे
उन सबसे तो मैं अच्छा हूँ
जीवन को अब क्या चाहिए
थोड़ी ख़ुशियाँ थोड़ी साँसे
मैं तो अब भी एक बच्चा हूँ
जल्द बड़ा भी हो जाऊँगा
फिर से खड़ा भी हो जाऊँगा
कैसा अकेला कौन अकेला
दूर खड़ा अब मौन अकेला
मेरे गीत और मेरे ठहाके
दूर रुकेंगे कही पे जाके
तब तक तो चलते रहना है
दीपक बन जलते रहना है ।

गाना तो सुना था
मैं और मेरी तन्हाई
पर देखूँगा भी
और भोगूँगा भी
ये हरगिज़ नहीं सोचा था
तन्हाई भी
कभी कभी प्यारी लगती है
पर
बोझ बन जाती है ज़्यादातर
इतना भारी बोझ
जो उठता ही नहीं है
फिर पटक कर बैठ जाना
उसी पर
और रास्ता भी क्या है
छोड़ो
इस बोझ को नहीं उठा पाओगे
इसलिए तन्हाई से भी प्यार करो
और
जीवन की नैया ऐसे ही पार करो । 
१--जीवन यात्रा से ---------------------------

बैठता हूँ रोज  इस इरादे के साथ की लिखू
पर उठ जाता हूँ बस सोच कर निरर्थक
क्या लिखूँ
वो बचपन जो गाँव में बीता था
खेती में खलिहान में और बगीचों में
गाँव के तालाब में भैंस की पीठ पर
अपने मुँह से
सीधी साधी गाय के धान से सीधे दूध पीना
या भैंस को दूहते बाबा का मुँह में धार मार देना
जानवरों के चारे की मशीन चलाना शौक़ से
या घूमना बेलो के पीछे पीछे
चाहे पानी खेत में पहुँचाने की रहट हो
या गाना पेरने का कोल्हू या
खलिहॉन में अनाज की दबायी
मचान पर सो कर या बैठ कर खेत की रखवाली
या ख़ुद के सर पर भी लाद कर लाना
वो गन्ना हो , मक्का हो , धान या जौ या अरहर
ख़ुद के खेत में गन्ना पर
चुपके से दूसरे का तोड़ कर चूसना
ख़ुद के पेड़ में पर आम पर
दूसरे के पेड़ पर पत्थर मार तोड़ना
पके है नीचे कि डालियों में भी आम
पर सबसे ऊँची डाल पर चढ़ वही तोड़ने की ज़िद
क्या लिख़ू
वो कपड़ा लपेट कर बनाया गया किताबों का बसता
वो लकड़ी की पट्टी और शीशी में घुली स्याही
काले रंग से रंग कर पट्टी को चमकाने की जद्दोजहद
गाँव में बेकार उग गए
नरगट को छील कर बनायी गयी क़लम
और उसी से लिखने की कोशिश
मास्टर साहब या मुंशी जी की आवाज के साथ
समवेत सवार में क ख ग या
दो दुनी चार के पहाड़े बोलने की आवाज़ें
क्या लिखू
वो गाँव में आयीं बाढ़ जिसके खेत में शौच भी मुश्किल
या वो बूढ़ा बहुत बड़ा साँप जिसे पूर्वज मानता गाँव
हल्ला बोल कर पूरे गाँव का तालाब में उतरना
और हलचल से मिट्टी हो गए तालाब से मछली पकड़ना
गाय भैंस चराना और अपनी गाय तथा भैंस को पहचानना
आवाज देने पर अपनी ही गाय या भैंस का आ जाना
उस पेड़ पर भूत की कहानी तो पोखरी मे चुड़ैल की
क्या लिखूँ
गाँव के पास के बाज़ार पर या आसपास लगने वाले बाज़ार पर
अलग अलग जंगह लगने वाले मेलों पर
या गाँव में बिना डरे बाहर सबके सोने पर
गाँव की हवा पर या कूँए के पानी पर
पेड़ों की अमरायी पर या छप्पर की उठायी पर
गाँव के संस्कार पर या अब के रिश्तों के व्यापार पर
ये सब पूरी कविता या कहानी के विषय है
इसलिए छोड़ देता हूँ आज इसे अनुक्रमिका मान कर
हा लिखूँगा सब पर क्योंकि जिया है मैंने ख़ुद ये सब ।

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

पच्चीस साल बाद फिर यही आएंगे ।

खिड़की से झांकता पहाड़
और
लाल ,हरे छतों वाले मकान
पहाड़ ढके है हरीतिमा से
और
देवदार के वृक्षो को देखकर
लगता है
उनमें प्रतियोगिता होती है
देखो जमीन से निकला मैं
निकल जाऊंगा सूरज के पास
कभी लगता है ऊँचाई पर बैठकर
कि
इन वृक्षो पर टंगे है ये घर
या घरो की दीवारों पर उगे है देवदार
सुबह एक पहाड़ के पीछे से
निकला था सूरज
और धीमी गति से
चलते हुए झांकता रहा मेरी खिड़की में
धीरे धीरे साथ छोड़ दिया सूरज ने
और थोड़ी देर बाद
किसी पहाड़ के पीछे छुप जायेगा
आभाहीन होकर साहित्य में
पर विज्ञानं उसे छुपने नहीं देखा
और न आभाहीन ही होने देगा
यही तो लड़ाई है
विज्ञानं और साहित्य में
एक कल्पनाओं की उड़ान
उड़ लेना चाहता है
उन्मुक्त होकर
जमीन से आकाश तक
और दूसरा
पटक देता है यथार्थ की जमीन पर
पर
मेरी खिड़की जीवन है
और सूरज की यात्रा हो
या पहाड़ और वृक्ष
जीवन यात्रा का संदेश देते है
अपने तरीके से
इतना चमकता सूरज
खो जायेगा कुछ देर में
और
कालिमा ढक लेगी जीवन को
और पसार देगी
जीव जंतुओं को तन्द्रा में
कुछ कल फिर उठेंगे
और चल पड़ेंगे फिर
जीवन की जद्दो जहद में
और
कुछ सोये ही रह जायेंगे
अनन्त यात्रा के लिए
पूरी हो जायेगी उनकी जीवन यात्रा
और छोड़ जायेगी कई सवाल
और बना जायेगी बहुतो को सवाल
ये खिड़की है या संसार का झरोखा है
निकल नहीं पा रहा हूँ मैं
पर महसूस रहा हूँ
किसी की पदचाप माल पर
उस टेनिस कोर्ट के सामने की सड़क पर
और
सुनाई पड़ रही है मुझे खिलखिलाहट
कुफरी के बर्फ में धंस गए पांवों की
जद्दोजहद के साथ
की आ पड़ा एक बर्फ का गोला मेरे ऊपर
फिर दूसरा और तीसरा ,पता नहीं कितने
बास्केटबॉल का हुनर काम आ रहा था
मैं भी बच नहीं रहा हूँ
और
क्यों बचू इस खेल से जो
आनंदित कर रहा है
अरे कहा खो गए
बर्फ के एक छोटे से पहाड़ के पीछे से
आती है आवाज
और अचानक लुढ़क जाता है
क्लामंडी खाते हुए मेरे पास आने को
चाय लाऊं साहब
ये क्या
यहाँ विज्ञानं ने नहीं
सेवाभाव ने तोड़ दिया
मेरा यादो का क्रम
विलुप्त हो गया वो
अनजाने को देख कर
फिर बहुत कोशिश की
कि आ जाये दुबारा
मेरे चिंतन और यादो के आगोश में
पर ना
जब मैं थी आप के पास
तो कोई आया कैसे
क्या चाय जरूरी है या मैं
बहुत कहा हां केवल और केवल आप
पर रूठ गए तो रूठ गए
बहुतो के जीवन में होता है
की रूठा हुआ फिर मानता ही नहीं ।
सूरज को भी मैं कहा पकड़ पाया
मन भर अपनी खिड़की में
चला ही गया अपनी तय यात्रा पर
उनको भी तो बहुत कोशिश किया था
पकड कर रखने की
कोई अपने जीवन को
छोड़ना भी कहा चाहता है क्या
पर कभी तेज बहाव में
कभी पहाड़ की फ़िसलन पर
हाथ छूट ही जाते है
छूट गया मेरा हाथ भीं
अचानक लगा की
कोई साया था मेरी खिड़की पर
पर मेरी आंखे कमजोर पड़ गयी
देवदार के ये पेड़ भी तो कभी भी
छोड़ देते है जमीन
और
ये पहाड़ भी कितने डरावने लगते है
कभी कभी
जब थोड़ा सा हिलती है जमीन
और क्रोधित हो ये टूट पड़ते है
जो भी आ जाये जद में उनपर
कही ऐसा तो नहीं कि
उनका हाथ नहीं छूटना था
पर इन पहाड़ो की तरह ही कुछ हुआ
और गिर पड़ा पहाड़
मेरे भी जीवन पर मेरे अपनों पर
हां तो बर्फ के गोले जो उन्होंने फेंके थे
वो न चोट देते है और न भिगोते है
पर भिगो देते है अपना तन और मन।
और सराबोर कर देते है प्रेम से
पर कभी कभी पता ही नहीं होता
कि बर्फ की चादर एक दिखावा है छल है
उसके नीचे एक खाई है
लील लेने को तैयार
जीवन में भी ऐसी बहुत सी खाइयां आती है
उस दिन टेनिस कोर्ट के सामने की सड़क पर
फिसल गया था मैं
और
उनकी खनकती हंसी रुक ही नहीं रही थी
अचानक चेहरा हो गया था सर्द
और निकल पड़ी उनकी चीख
जब नीचे सरकता गया मैं
हाथ में आ गयी कोई घास जैसी चीज
और रोक लिया था पीछे किसी के हाथों ने
तुरंत मोची के पास जाकर ठुकवाये थे
जूते के तले और एड़ियों में
रबड़ या टायर के टूकड़े
फिसलने से बचने को
पहली बार सुना था कुछ चीनी खानों का नाम
उस दिन शाम
शाम कहा रात थी वो
ये पहाड़ मुझें न चैन से सोने दे रहा न जगने
पकड़ने की कोशिश करता हूँ यादो को
कितनी तरह के भाव बदल देते है पल पल
इतनी दूर से पहचानने की कोशिश कर रहा हूँ
वो होटल और उसकी वो खिड़की
इससे निहारते रहे हम दृश्य
और समेटते रहे अपनी यादो को
आज भी तो यादे ही तो समेट रहा हूँ मैं
तभी कोई आवाज आती है कही दूर से
मुझे लगता है
कोई इठला कर बोल रहा है
यहाँ 25 साल बाद हम फिर आएंगे ।
खो गयी वो आवाज ,वो हंसी
दूर कही बहुत दूर
पर सुनाई पड़ रही मुझे
आज 34 साल बाद भी
बिलकुल जीवंत जैसे वीणा के तार
छेड़ दिए हो किसी ने
पर
जाने देता हूँ यह यात्रा और ढूढता हूँ
कुछ निशान ,कुछ यादे ,कुछ वादे
और आंख बंद कर लेता हूँ
पहाड़ की हरियाली
कुछ स्याह होती जा रही है
सूरज की बिछडन के साथ
और
वो खनखनाहट कही
अनंत में डूबती जा रही है ।
बस एक वादे के साथ
पच्चीस साल बाद फिर यही आएंगे ।

रविवार, 12 मार्च 2017

सभी रंग अपने है

सभी रंग अपने है
वो लाल हो ,केसरिया हो
हरा हो या नीला
बैगनी हो या पीला
या जो भी हो
जिसे जो पसंद
वो लगालो
दूसरे को पसंद
तो उसपर भी डालो
पर
उसमें कोई खतरनाक चीज न हो
और न इरादे हो खतरनाक
जी हां खूब खेलो रंग और गुलाल
पर न हो धरती खून से लाल
ऐसा समाज बना लो
जी हां
ये इतने सारे रंगों का नाम ही
हिंदुस्तान है
जहा एक ही रंग है वो मिस्र ,अफगानिस्तान
और पाकिस्तान है ।
क्या वो एक रंग पसंद है
या ये हिंदुस्तानियत का रंगारंग
आप गले मिलो
पर नफरत के खंजर को फेंक कर आओ
हां आओ सभी रंगों को मिला कर होली मनाओ 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

तुम्हारा सलूक मुझसे जब इतना सर्द होता तुम्हे कैसे बताऊँ मुझको कैसा दर्द होता है ।

तुम्हारा सलूक मुझसे जब इतना सर्द होता
तुम्हे कैसे बताऊँ मुझको कैसा दर्द होता है ।

कोठे बेशक बहुत बदनाम है लेकिन कोठियो के खिड़की मे झांक मत लेना ।

कोठे बेशक बहुत बदनाम है लेकिन
कोठियो के खिड़की मे झांक मत लेना ।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

उसे गिरना अच्छा लगता है

उसे ऐसा क्यों लगता है
कि
वो गिर गया है
और
खुद में एक बड़ा सवाल बन गया है
जिसे सुलझाने का कोई यंत्र नहीं
सुलझाते सुलझाते
और उलझ जाता है वो
अपने बनाये सवाल में
फिर सोचता है कि
वो अकेला तो नहीं गिरा
खाई थी
तभी तो गिरा
कितना दोगला है वो
वो खुद गिरना चाहता है
और गिरना चाहता है
फिर भी
खुद को धोखा देता है
शर्मिंदा होने के अभिनय से
और
खुद को सवाल बना कर
गिरना
उसका नशा बन गया गया है
और
उसकी नियति भी ।
पर कही तो ठहरेगा
उस दिन सवाल भी ठहर जायेंगे
और
उसके द्वन्द भी ।

शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

मन गयी मेरी भी दीवाली

मन रही है दीवाली 
हर साल की तरह 
कम होते गए घर से लोग 
अब रह गए हम दो
लोगो के घरो में 
बने है पकवान 
मेरा बेटा भी होटल से 
लाया है पकवान 
लोगो के घरो में 
सजी है रंगोली 
मेरे बेटे ने भी 
कुछ रख दिया है
जमीन पर 
लोगो के बच्चे और बड़े भी 
छोड़ रहे है पटाखे 
मैं बिस्तर पर पड़ा 
सुन रहा हूँ आवाजे 
और 
मेरा बेटा बाहर खड़ा 
देख रहा है सबको फोड़ते 
मेरे घर भी आई है मिठाई 
पर  पता नहीं क्यों 
मिलने आने वालो की तादात 
घट जाती हैं बुरी तरह 
जब किसी पद पर नहीं होता हूँ मैं 
हमने खरीदा है कुम्हार के बनाये 
दिए और लक्ष्मी गणेश 
थोड़ी सी खील और बतासे भी 
ताकि इनको बनाने वालो की 
कुछ मदद हो जाये
और
हार न जाये ये 
देश के दुश्मन चीन से 
और मन गयी 
मेरी और मेरे बेटे की भी दीवाली

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

ये समंदर का किनारा

ये समंदर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं
और
पानी हां पानी भी बहुत है
प्यास है खूब प्यास
पर पी सकते नहीं है ।
किस लिए फिर
इसकी चाहत
क्या मिलेगा
इन लहरों को गिनकर
या
इनसे टकरा कर
क्या मिलता है
इस रेत से दिल लगाकर
क्यों जाते है हम
इतनी दूर दूर
बस ये रेत देखने
लहरे गिनने
या
लहरों में गिर जाने को
मुझको तो
कुछ समझ न आया
सब माया है केवल माया ।
ये किनारा ,ये लहरे औ ये पानी
जो खारा है
आखो के पानी से भी क्या
ये बालू कितनी निर्मम है
मेरे जीवन से भी क्या ।
ये समन्दर का किनारा
रेत है और कुछ नहीं ।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

जयप्रकाश

जयप्रकाश जयप्रकाश रट रट के लोग यहाँ
देश के प्रधान और मंत्री बन आये  थे,
साथ साथ चीखते थे क्रांति क्रांति उनके वे
चौहत्तर में क्रांति का शंख जो बजाये थे
समझी थी जानता कुछ भला करे देश का ये
इसीलिए वोट उनको ही डाल आये थे,
पर पता चला की एक सत्ता को हटा के यारो
सत्तालोलुपो  की पूरी फ़ौज ले आये थे  ।
(1977  में लिखा था ये मैंने )

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मैं मर भी जाऊं तो

मैं मर भी जाऊं तो क्या होगा
शायद अगर हुआ तो
चार कंधे
कुछ लकड़ियाँ
और आग के शोले
कुछ क्षण की
कुच्छ सिसकियाँ
कुछ कहानिया
कुछ शिकायतें
कुछ झूठी अच्छाइयां
बहुत सी बुराइयाँ
क्या किया जीवन में
बेकार था कुछ न किया
जिम्मेदारियां भी छोड़ गया
नालायक था कुछ नहीं किया
बार बार बोर होकर भी
दोहराई जाती वही कहानियां
उठावनी हो गयी
घर वालो का बोझ कुछ कम हुआ
लो तेरही भी आ गयी
ये भी खर्च कवाएगी
कोई रिश्तेदार रुक न जाये
चलो सब चले गए
अब देखो कहां क्या क्या है
बाट लो किसका क्या है
और
चल पड़ेगी जिंदगी
अपने अपने रस्ते पर
एक कोने में टंगी तस्वीर
साल में एक बार शायद
बदलेगी माला
और हाथ जोड़ कर भागते हुए लोग
आज तो देर हो गयी इस चक्कर में
पता नहीं क्यों बने है ये रिवाज
इसलिए
मेरे लिए मेरी वसीयत है
की
कोई नहीं रोयेगा
बिजली में जला देना मुझे
किसी नदी में नहीं बहाना मुझे
मैं नहीं मानता कोई पूजा इसलिए
न कोई पूजा और न उठावनी तेरही
अगले ही पल से सब खुश रहो
और अपनी जिंदगी जियो
मेरे लिए न कभी कोई पारेशान हुआ
न किसी को होना है
वर्ना मैं परेशान हो जाऊंगा
कुछ नहीं है मेरे पास
की कोई लडे की किसका क्या
बस मेरी यादे कभी क्रोध लायेंगी
की नालायक बाप ने कुछ नहीं किया
यही मेरी वसीयत है ।
मैं चला जाऊंगा तो भी
कुछ नहीं होगा
सब जैसे था वैसे ही चलेगा ।
बस मेरा आशीर्वाद ही मेरी वसीयत है
जो किसी काम नही आएगी
इसलिए मैं रहूँ या न रहूँ
कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया ऐसे ही चलती है ।
और मैं भी चुपचाप ऐसे ही चला जाऊंगा
शायद लावारिश होकर
की किसी को कोई कष्ट ही न हो ।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

हां जीवन इसको कहते है |

जिंदगी
कब होगी पहचान हमारी
इतने सालो से है दूरी
क्या मजबूरी
जिन्दा तो है
पर क्या सचमुच
क्या जीवन इसको कहते है
पांव में छाले भाव में थिरकन
गले में हिचकी आँख में आंसू
नीद नहीं और पेट में हलचल
ना पीछे कुछ ,ना आगे कुछ
बस अन्धकार है
क्या जीवन इसको कहते है
जीवन कब हमको मिलना है
या फिर ऐसे ही विदा करोगे
कुछ तो सोचो
हम दोनों क्या जुदा जुदा है
कुछ तो बोलो
और भविष्य के ही पट खोलो
या फिर कह दो
हां जीवन इसको ही कहते है |
जींना है तो हंस कर जी लो
या फिर दर्द गरल को पी लो
तेरे हिस्से में बस ये है
मैं भी तो मजबूर बहुत हूँ
तेरी खुशियों से दूर बहुत हूँ
चल अब सो जा
अच्छे सपनो में आज तो खो जा
कल फिर मुझसे ही लड़ना है
हां जीवन इसको कहते है |



शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैं भी टूट जाऊँगा

मैं तुमसे रूठ जाऊं
चलो मैं रूठ जाता हूँ
मैं जानता हूँ
तुम मना लोगे मुझे
तुम मुझसे रूठ जाओ
चलो फिर मैं मानता हूँ
मगर दोनों जो रूठे
तो गजब हो जायेगा
न तुमको मैं मनाउंगा
न मुझको तुम मानवोगे
मैं भी टूट जाऊँगा
तुम भी टूट जावोगे ।

मंगलवार, 28 जून 2016

रोटियों में आग है और आग से है रोटियां

रोटियों में आग है और आग से है रोटियां
आग में ही जल रही है ढेर सारी बोटियाँ
बोटियों और रोटियों की ये लड़ाई आम है
इस लड़ाई में राजनीती चलती है गोटियाँ ।
पेट में जब आग हो तो काम आये रोटियां
दिल में जब आग हो तो जल जाएँ बोटियाँ ।
क्रांति क्रांति का घोष गूंजता जब जनता में
ना रहती है रोटियां और न रहती है बोटियाँ ।
(पूरा कल करने की कोशिश होगी )

वो मुझसे मेरी धूप और सवेरा ले गया नीद की ख्वाईश थी तो अँधेरा ले गया ।

वो मुझसे मेरी धूप और सवेरा ले गया
नीद की ख्वाईश थी तो अँधेरा ले गया ।

शुक्रवार, 24 जून 2016

इस राजनीती की मंडी में ।

क्या कहा,किसने कहा और कब कहा,किससे कहा
क्यूँ याद करते हो साहब, इस राजनीती की मंडी में ।