शनिवार, 25 अगस्त 2012

ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

बारिश आयी
नदिया
खतरे के निशान से
ऊपर हुयी और बह गयी
बाढ आई
बहा दिए लोगो के
घर ,सुख चैन
और ख़त्म हो गयी
बाकी दिनों पूरा देश
पानी को तरसता है
जंतर मंतर और
रामलीला मैदान में
ऐसी बाढें अक्सर आती है ।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

होली नहीं खेलता मै

होली नहीं खेलता मै
बचपन बीतने के बाद से
बचपन कब बीता और मै बड़ा हो गया
पता ही नहीं चला
क्योकि अपने जिनके कारण
हम बचपन पकडे रखना चाहते है
वे हाथ छोड़ झटक देते है बचपन को
साया देने वाले अधिकार को
खैर होली नहीं खेली बहुत साल से
तभी कोई आया हवा का झोंका बनकर
खाली जीवन में और अपने साथ लायी
एक मुट्ठी बदली और
बंजर जमीन पर नम हवा तथा
मुट्ठी भर बदली से निकली फुहार ने
उगा दिए कुछ पौधे
होली मै तब भी नहीं खेलता था
परन्तु रंगों से सराबोर हो जाता था
अच्छा लगता था
किसी का ठठा कर हँसना
खुद रंगा होकर सबको रंग देना
ठहाकों से तथा अपने रंगों से
मेरी बंजर जमीन पर उगे पौधे
जब एक दिन पहले तैयारी करते थे
कपड़ों की रंगों की तथा पिचकारी की
अगले सुबह ही उठकर शरीर पर मलते थे
तेल या क्रीम ,रंगों से बचने को
फिर रंग फेंकते थे ,बचते थे और
खुद रंग भी जाते थे सराबोर
फिर शीशे में खुद को पहचानना और
दूसरों को देख कर ठठा कर हँसना
फिर प्यार से गोद में बैठ कर अपने रंगों
से सराबोर कर  देना मुझे भी
कितना सुखद था ,कितनी ऊर्जा थी
कितना जीवन था ,जीवन का अर्थ था
फिर अचानक बुलावा आ गया किसी का
जहा से आई थी बदली
मै ही भूल गया था बादल आते है
बरसते है ,धरती को नमी देते है
कुछ बारिश रुक जाती है
जीवन बन कर जीवन के कुए में ,
तालाब में या  झील में
और कुछ को सूरज सोख लेता है वापस
और पहुंचा देता है वही हर बूँद को
जहा से उसे दुबारा तय करना होता है सफ़र
इस क्रिया को भूल जाना और
न पकडे जाने वाली चीज को
पकड़ कर रखने की कोशिश ही शायद
संबंध है ,संवेग है और अनबूझ पहेली भी
मै फिर अकेला निहार रहा हूँ
लोगो को होली खेलता होली की बात करता
मैंने भी सन्देश भेज दिया और हो गयी होली
धीरे धीरे मेरे पौधे भी अपनी नयी जमीन
तलाश लेंगे जहा वे विस्तार पा सके
और फिर मेरा भी सफ़र शुरू हो जायेगा
अपनी बदली को ढूढने और
उसमे समाहित हो जाने का  ।





ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है

ये अधियाँ है पेड़ों को जड़ो से उखाड़ देती है 
जीवन में आती है तो जीवन बिगाड़ देती है ।
इतना मत इतराओ अपने दौड़ने पर यारो
ये आंधियां है जो वक्त को भी पछाड़ देती है ।

संसद में ये बहस है कि बड़ा चोर कौन

संसद में ये बहस है
कि बड़ा चोर कौन
संसद भी है मौन
सांसद भी मौन
ये बड़ी बहस है
निर्णय करेगा कौन
वोटर हैरान है
मानस परेशान है
मौन संविधान है
ये कौन सा विधान है
सब लोकतंत्र लोकतंत्र
खेल रहे है
हम तठस्थ बन कर
इन्हें झेल रहे है
फिर सवाल अपनी जगह
ही खड़ा हुआ
हमारी तटस्थता से बड़ा हुआ
कौन बड़ा चोर है
कुछ लोग या हम सब
क्योकि हम तठस्थ है
नून तेल में व्यस्त है
देश चाहे रहे या भाड़ में जाये
जहा कही माल हो
मेरे घर में आये
तब क्या सवाल है
काहे का मलाल है
कौन बड़ा चोर है
तोर है या मोर है
पर अब तय ये रहा
हम सब चोर है
या तो जागो खड़े हो
संसद से भी बड़े हो
या फिर सत्ता सौप दो
राजा रजवाड़े को
और खुद को सौंप दो
भेड़ वाले बाडे को
लोकतंत्र का खेल
हो गया है झेलमझेल
या संविधान बांच ले 
पुरसार्थ मांज ले
अपना ज्ञान जाँच ले
और तिरंगा थाम ले
बापू ,सुभाष नाम ले
देश के सवाल पर
जाति ,धर्म छोड़ दो
बस अपने स्वार्थों
का रुख जरा मोड़ दो
संसद जगा दो तुम 
भ्रस्टों को भगा दो तुम 
देश को मजबूत कर
मत डर ,मत डर ,मत डर  ।


क्या फर्क है माँ और माँ में

आपने देखा है
उस चिड़िया को
परेशान चीखते हुए
और मंडराते हुए
घोसले के आस पास
किसी से अपने बच्चो की
सुरक्षा की चिंता में
जिसका मुकाबला नहीं
सकती है वो
कभी देखा है किसी माँ को
टपकती छत से हर तरह
जतन कर भीगने से बचाती
अपने छोटे बच्चों को
मैंने दोनों को गौर से देखा है
क्या फर्क है माँ और माँ में
चाहे ओ इन्सान हो या चिड़िया
माँ खुद पर ले लेती है
हर मुसीबत
और बचा लेती है बच्चो को
अपनी सामर्थ्य भर
पर क्या बच्चो को याद रह जाता है
ये सब
नहीं न
क्योकि वे तब अबोध बच्चे थे ।

बेटियां खीच लेती है

बेटियां खीच लेती है
सारा प्यार पापा का
और बेटा दीदियों से
प्यार खीच लेता है
और माँ से भी
कभी माँ ही पिता और
पिता ही माँ दोनों हो जाते है
अनचाहे कारणों से
तब प्यार बंट जाता है
बराबर बराबर
पर फिर भी बेटियां
पा जाती है ज्यादा प्यार
और बेटा बन जाता है संबल ।

तन है ,मन है और मस्तिस्क

तन है ,मन है और मस्तिस्क
शरीर है ,दिल है और दिमाग
दोनों एक ही है
तन की तड़प अपनी है
मन की तड़प अपनी है
और मस्तिस्क की अपनी
शरीर, दिल और दिमाग की
भी यही ,दोनों एक है ना ,
शरीर कुछ चाहता है
मन रोक नहीं पाता 
और मस्तिस्क भी
मन कुछ चाहता है
और शरीर साथ नहीं देता
मस्तिस्क विद्रोह कर देता है
कभी कभी
मस्तिस्क रास्ते तय करता है
मन विचलित हो जाता है
और शरीर अलग चला जाता है
लड़ते रहते है तीनो ज्यादातर
कभी कभी ही तीनो एक ही
दिशा में चलते है
और जिंदगी तब हो जाती है हसीन ।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

दिल है और दर्द है

दिल है और दर्द है
दिल हँसता है
दर्द रोता है
जब दिल रोता है
तो दर्द हँसता है
और दोनों के बीच
कोई दर्द के कीचड में
धंसता है
वो मै हूँ या आप है
या और कोई
पर कहानी तो सच्ची है
दिल की और दर्द की ।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

इतनी जिंदगी बीत गयी

इतनी जिंदगी बीत गयी
संघर्ष के साथ ,
पर पहली बार लग रहा है
की थकने लगा हूँ और अब बस
और क्या संघर्ष करना
और किसके लिए करना
पर मै फिर खड़ा होऊंगा
और चल पडूंगा
क्यों की मेरा स्वाभाव
थकना और पलायन नहीं है ।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कितने बदकिस्मत होते है

कितने बदकिस्मत होते है
वे लोग
जिन्हें दूसरे नही अपने ही
मारते है बार बार
वो मार खाकर गिरता है
फिर हिम्मत जुटा कर उठता है
सोचता है अब चलूँगा मै भी
कि फिर कोई बहुत अपना
तोड़ देता है उसके पैर
फोड़ देता है उसकी आँखें
और कुचल देता है
उसके चलने के इरादे
क्या करे ये बदकिस्मत
छोड़ दे हर अपने को
क्योकि
बाहर वाले तो कभी
कुछ बिगाड़ नहीं पाए
वो कैद हो गया है
अपने  जो दुश्मन है
उनकी कैद में ।